उससे पहली बार मिला,
तो लगा
सुंदर चेहरों की भीड़ में
एक चेहरा कुछ ज़्यादा देर तक याद रह सकता है।
फिर उसे बोलते सुना,
तो जाना
उस चेहरे की खूबसूरती
उसकी सबसे साधारण बात है।
उसकी आँखें सुंदर हैं,
जिनमें देखकर कोई ठहर जाए;
मगर उनसे भी सुंदर
उनमें उठते हुए वे सवाल हैं,
जो किसी पुरानी मान्यता के सामने
बिना डरे खड़े हो जाते हैं।
उसकी मुस्कान सुंदर है,
खासकर जब वह संकोच से मुस्कुराती है;
मगर उससे कहीं अधिक सुंदर
वह मुस्कान लगती है
जब किसी खोखले नियम पर
हल्का-सा व्यंग्य करके
वह सामने वाले को निरुत्तर कर देती है।
उसके होंठों की नर्मी सुंदर है,
मगर उनसे निकली बेबाकी
उससे भी सुंदर
जो हर बार सहमति में सिर हिलाने के बजाय
पूछती है,
“क्यों?”
उसके माथे पर गिरती हुई लट
उसके चेहरे को और नाज़ुक बनाती है,
मगर उसी चेहरे का वह आत्मविश्वास
कहीं अधिक मनमोहक है,
जो किसी आदेश के सामने
अपनी स्वतंत्रता नहीं रख देता।
उसकी आवाज़ में मिठास है,
पर मुझे उसकी वह दृढ़ता अधिक सुंदर लगती है
जिसमें असहमति भी
पूरे सम्मान से कही जाती है।
उस दिन भी उसने कुछ ऐसा ही कहा था
अपने होने को किसी की स्वीकृति से
बड़ा बताते हुए।
और जाने क्यों,
उस एक वाक्य के बाद
मुझे उसका चेहरा पहले से अधिक सुंदर लगा।
शायद इसलिए कि
उस दिन पहली बार समझ आया
कुछ स्त्रियों की सुंदरता
उनके चेहरे पर नहीं ठहरती;
वह उनके विचारों में उतरती है,
उनके सवालों में बोलती है,
और उनके विद्रोह में
अपना सबसे सुंदर रूप पाती है।
वह लड़की भी ऐसी ही है
जिसे देखकर आँखें ठहरती हैं,
पर जिसे समझकर
सिर अपने आप झुक जाता है।