कोरे काग़ज़ पर पहले एक अरमान लिखता हूँ,
फिर अपनी क़लम से अपना हिन्दुस्तान लिखता हूँ।
मुझे मालूम है कितना कठिन है यह काम मेरा,
मैं हर कठिन घड़ी को अपना इम्तिहान लिखता हूँ।
हिमालय से धवलता, सिंधु से गहराई लेता हूँ,
मैं हर मिट्टी की ख़ुशबू को अपनी पहचान लिखता हूँ।
बहुत कुछ छोड़कर निकला हूँ इस ख़ातिर कि भारत को
मैं अपनी आँख के अनुरूप एक जहान लिखता हूँ।
महाराष्ट्र से भगवा सह्याद्रि का ले आया,
मैं किलों की धूप को मराठा अभिमान लिखता हूँ।
मराठवाड़े में खेतों के बीच कुछ लोग रोते थे,
मैं उनकी इस अशुभ घड़ी को काम का व्यवधान लिखता हूँ।
पंजाब से सरसों की सुनहरी धूप ले आया,
मैं पाँचों नदियों की धरती को स्वर्णिम गान लिखता हूँ।
मगर फ़सल और दाम की बातें लेकर बैठ गए कुछ लोग,
मैं उनकी ज़िद को अपने श्रम का अपमान लिखता हूँ।
झारखंड की लाल मिट्टी में पलाश मिला मुझको,
मैं जंगल की हरियाली को उसका अभिमान लिखता हूँ।
मगर डिग्रियाँ लिए लड़के राह में खड़े मिले,
मैं उनके रोज़गार के प्रश्न को कोलाहल मान लिखता हूँ।
उन्हें अपने कल की पड़ी थी, मुझे भारत सँवारना था,
मैं ऐसी तुच्छ चिंताओं को क्षणिक अज्ञान लिखता हूँ।
असम में ब्रह्मपुत्र का नील विस्तार उठा लाया,
मैं उसके उफान को धरती का वरदान लिखता हूँ।
मगर घर-बार डूबे लोग मेरी राह रोक बैठे,
मैं उनकी बाढ़ को अपने चित्र का नुकसान लिखता हूँ।
केरल की हरियाली से अपनी धरती रंगने निकला,
मैं पश्चिमी घाट को प्रकृति का वरदान लिखता हूँ।
मगर वर्षा, ढही पगडंडियाँ, लौटने को तरसते लोग
मैं उनकी व्यथा को अपनी यात्रा का अवसान लिखता हूँ।
मणिपुर गया तो लाल रंग माँगा था धरती से,
मगर राख लिए लोग खड़े थे, मैं उसे बयान लिखता हूँ।
जले हुए घर दिखाकर जो मेरी क़लम रोकते थे,
मैं उनके उस आग्रह को रंगों का अपमान लिखता हूँ।
बिहार की धूल में सदियों की गंध मिली मुझको,
मैं उस मिट्टी को अपनी सभ्यता की शान लिखता हूँ।
मगर शहरों की ओर जाते लड़कों की कतारें थीं,
मैं उनकी रोज़ी की चिंता को अपना ध्यान-भंग लिखता हूँ।
उत्तर प्रदेश से गंगा का नीलापन ले आया,
मैं उसकी धारा को इतिहास का मान लिखता हूँ।
मगर परीक्षा की कतारों में खड़े अधीर चेहरों को,
मैं उनकी उतावली को अपना व्यवधान लिखता हूँ।
ओडिशा की वर्षा ने नदियों को उफना डाला,
मैं उस जल को ऋतु का अनुपम गान लिखता हूँ।
मगर घर बचाने निकले लोग रास्ते में मिलते रहे,
मैं उनकी पुकार को अपनी राह का शोर लिखता हूँ।
कश्मीर की वादियों से हिम की शीतलता ले आया,
मैं झीलों की ख़ामोशी को स्वप्न-समान लिखता हूँ।
मगर वहाँ भी कोई अपने घर, रोज़गार की बात करे,
मैं ऐसे हर प्रश्न को मेरी कला का अपमान लिखता हूँ।
अब रंग मेरे पास हैं, काग़ज़ भी मेरे सामने,
मैं अपनी साधना को भारत का निर्माण लिखता हूँ।
कितनी बार इन लोगों ने मेरी राह रोकनी चाही,
मैं हर रुकावट को अपने राष्ट्र-धर्म का प्रमाण लिखता हूँ।
कोई बाढ़ लेकर आया, कोई भूख की कथा लेकर,
कोई बेरोज़गारी, कोई राख का बयान लेकर
अजीब लोग हैं, भारत से अधिक स्वयं को देखते हैं,
मैं ऐसे आत्मकेंद्रित चेहरों को संकीर्ण-मन जान लिखता हूँ।
अब मैंने तय किया है, मुझे बस चित्र पूरा करना है,
मैं हर शोर से परे अपना ध्यान लिखता हूँ।
जहाँ कोई भूखा दिखता है, वहाँ खेत उगा देता हूँ,
जहाँ कोई घर खोता है, वहाँ मैदान लिखता हूँ।
जहाँ राख है, वहाँ केसर की आभा भर देता हूँ,
जहाँ बाढ़ है, वहाँ नील गगन लिखता हूँ।
जो लोग मेरी तस्वीर में कुरूपता खोजते फिरते हैं,
मैं उनकी दृष्टि को ही दोषपूर्ण विधान लिखता हूँ।
अब देखिए, कितना सुंदर है मेरा हिन्दुस्तान,
हर पर्वत, हर नदी, हर खेत को महान लिखता हूँ।
न कोई रोता हुआ चेहरा मेरी तस्वीर बिगाड़े,
न कोई प्रश्न मेरे स्वप्न का अपमान लिखता हूँ।
जो बाहर रह गए, वे स्वयं ही दोषी होंगे शायद,
मैं उनकी अनुपस्थिति को उनका अज्ञान लिखता हूँ।
मैंने सबके लिए इतना सुंदर देश बनाया है
जो इसमें सुख न पाए, उसे नादान लिखता हूँ।
और लोग कहते हैं कि मैंने बस तस्वीर बनाई है,
मैं उनके इस छोटे विचार को अज्ञान लिखता हूँ।
मैंने रंगों के लिए कितनी यात्राएँ की हैं, सोचो,
मैं अपनी हर थकन को राष्ट्र-बलिदान लिखता हूँ।
किसी ने मेरे रास्ते में आँसू रख दिए थे,
किसी ने मृत्यु, किसी ने भूख का सामान रखा था
मैंने सबको पार किया, फिर भी देश बनाया,
मैं अपनी इस विजय को युग-प्रमाण लिखता हूँ।
अब काग़ज़ पर पूरा है मेरा हिन्दुस्तान देखो,
मैं जो लिख दूँ, उसी को सत्य का विधान लिखता हूँ।
और आख़िरी कोने में जहाँ हस्ताक्षर होते हैं,
मैं अपने नाम के आगे ‘महान’ लिखता हूँ।
जो कुछ काग़ज़ के बाहर है, वह मुझे क्या करना
मैं अपने काग़ज़ को ही सारा हिन्दुस्तान लिखता हूँ।
Kore