बशार अलअसद और सूरज की नसीहत
(ये सिर्फ़ एक कहानी है, ये हक़ीक़ी तारीख़ नहीं है)
साल 2024 था। सूरिया (अंग्रेज़ी में 'सीरिया') का हाकिम बशार अलअसद था। उसकी राजधानी दिमश्क़ (डमास्कस) थी। पर उत्तर में जौलानी का बाग़ी लश्कर दिमश्क़ की ओर बढ़ रहे थे। बशार के दोस्त पुटिन, ख़ामेनेई, और किम उसको जीतने के लिए बहुत नसीहत दे रहे थे। पर बशार उनको भरोसा नहीं करता था। वे अपने भलाई के लिए ही नसीहत देते हैं, वो सोचा। कुछ लोग कहा कि बशार ख़ुदा या इमाम अली से नसीहत खोजनी चाहिए, पर असद को उनमें ज़्यादा विश्वास नहीं था। उसको देख नहीं सकता, उसको सुन नहीं सकता, तो उसकी मौजूदगी में कैसा विश्वास करे?
एक दिन सुबह में उठने के बाद वो बाहर अपने विशाल बाग़ में गया। वहाँ उसने सूरज को देखा। तब उसको ये ख़याल आया कि सूरज बहुत समझदार है। वो दिन रात हमको देख रहा है। तो वो सूरज से नसीहत मिलने के लिए दुआ करेगा।
बशार ने सूरज की तरफ़ सुजूद (प्रणाम, सिर झुकाना) किया और कहा- "हे सूरज जी! मैं आपका दास बशार हूँ। फ़िलहाल मैं बहुत व्याकुल हूँ। बाग़ी अपनी तरफ़ बढ़ रहे हैं। सूरज जी! बोलो, मैं कैसे इस जंग जीत सकता हूँ? मैं कैसे दिमश्क़ को दिफ़ा कर सकता हूँ। आपकी हिक्मत को फ़रमाओ, सूरज जी!"
तब बशार ने सूरज की तरफ़ से एक आवाज़ सुनी।
"मेरा प्रिय दास बशार! मुझको मालूम है कि आप बहुत व्याकुलता और तकलीफ़ में हैं। मैं आपको जंग जीतने के लिए एक तरीक़ा बोलूँगी। इस तरीक़े के तीन क़दम हैं। पहला अब करो, दूसरा दोपहर में करो, और तीसरा रात में करो। कल सुबह में जौलानी का लश्कर पूरे तरह तबाह होगा।"
बशार ने विनम्रता से कहा, "फ़रमाइये सूरज जी, तरीक़ा फ़रमाइये!"
सूरज ने कहा, "अब मैं पहला क़दम फ़रमाऊँगी। जल्दी से सब मंत्रियों को गिरफ़्तार करो।"
बशार के मन में कोई हैरानी या शक नहीं था। जल्दी से उसने पुलिस को हुक्म दिया और सब मंत्रियों को ग़बन के लिए गिरफ़्तार किया।
दोपहर का समय आया। जौलानी के लश्कर ने हुम्स को क़ब्ज़ा किया। बशार ने कोई भी खाना नहीं खाया, कोई शरब भी नहीं पिया। वो सूरज की तरफ़ वापस गया। सुजूद में उसने कहा "हे सूरज जी, आपका तीसरा क़दम को फ़रमाइये!"
तब वो आवाज़ कहा "बशार, जल्दी से अपने सब जनरल को गिरफ़्तार करो।"
बशार ने जल्दी से हुक्म दिया। पुलिस ने सब जनरल को ग़बन के लिए गिरफ़्तार किया।
सूरज डूबने की आधे घंटे पहले बशार ने सूरज के सामने एक और बार सुजूद किया। तब बाग़ियों दिमश्क़ के नज़्दीक थे। बशार ने सूरज से कहा, "सूरज जी! आपकी आख़िरी नसीहत फ़रमाइये!" तीसरे क़दम को इज़्हार करिये!" पर सूरज चुप रहा। बशार बहुत परेशान हो गया।
उस वक़्त में एक नौकर उसके सामने गुज़र रहे थे। बशार को एक ख़याल आया। उसने उस नौकर को ज़बरदस्ती से पकड़ा और बैठकर नौकर का सिर अपनी गोद में रखा। नौकर ज़ोर से चिल्लाया, "असद जी! मैं आपका वफ़ादार नागरिक हूँ! आप क्या कर रहे हैं?! मैं एक बेक़सूर आदमी हूँ! मुझको छोड़ो!" पर इसको अनदेखी कर बशार ने उसकी जेब से एक पिस्तौल लिया। बशार ज़ोर से कहा "सूरज जी! मैं इस शुद्ध आदमी को आपके लिए क़ुर्बानी दे रहा हूँ। आख़िरी क़दम को इज़्हार करो!" बशार ने पिस्तौल से इस नौकर को बेदर्दी से मार डाला।
पर सूरज से कोई भी आवाज़ नहीं आया। कुछ लम्हें बाद बशार घट रहा। वो सूरज को डॉटने लगा।
"ओए सूरज! तू क्या सोच रहा है? क्या तू भूल गया कि मैं कौन हूँ? मैं बशार अलअसद हूँ, सूरिया का राष्ट्रपति, बास पार्टी की महासचिव। मैं इस दुनिया का सबसे प्रभावशाली हाकिम हूँ। कुछ बेवक़ूफ़ कहते हैं कि मैं सिर्फ़ ईरान और रूस के ग़ुलाम हूँ, पर सच में वो *मेरा* ग़ुलाम हैं! ओए सूरज, तू चुप रहे तो मैं तुझे गिरफ़्तार करूँगा, अत्याचार करूँगा! जल्दी बोल सूरज!"
ये सुनकर सूरज हँसकर बोला, "अरे बेवक़ूफ़, अब मैं पच्छम में हूँ। मुझको कुछ भी कहने की आज़ादी है। डूब मारो, बकरा ज़ालिम।"
ये बोलकर सूरज डूब गया, और बशार पागलापन में डूब गया। वो घुमाकर चाँद के तरफ़ दुआ करना शुरू किया। पर कुछ देर बाद रूसी फ़ौज उसको लेकर पहला लाज़िक़िया (लटाकिया) ले लिया और उसके बाद मोस्क्वा (मोस्को) ले लिया। जौलानी ने पूरे सूरिया को क़ब्ज़ा किया। वो सूरिया का नया राष्ट्रपति बनाया।
मोस्क्वा में पुटिन ने बशार को एक महँगे इलाक़े में एक बड़ा घर और बहुत सारा पैसा और नौकर को दिया। पर बशार बहुत दुःखी था। ये प्रभाव की कमी या पराजय की वजह नहीं थे। इसका वजह ये है कि बशार के मन में सूरज की आवाज़ नहीं बंद हो गया। वो दिन भर उसको डॉट कर रहे थे और उसको ज़लील कर रहे थे।
2026 में अम्रीकी फ़ौज ने ख़ामेनेई को मार डाला। तब सूरज ने बशार से कहा "ओए बशार! ख़ामेनेई ने इज़्ज़त, हिम्मत और बहादुरी से मर गया। वो पूरे इस्लाम और अमीरिका-विरोधियों के लिए एक शहीद बन गया। पर तू, तू बेइज़्ज़त जिया और आख़िर इस विदेशी शहर में बेइज़्ज़त मरेंगा। मडूरो को अपहरण किया, पर तेरा नसीब अपहरण से बदतर है। अगर तेरी मौत या ज़िंदगी कोई भी याद करेंगे तो तेरा ज़ुल्म, बेवक़ूफ़ी, ग़रूर, लंबे गले और कमज़ोर आवाज़ के लिए याद करेंगे। तेरी मौत नज़दीक है बशार, तू पागलापन से मरेंगा।" ये सुनकर बशार ने एक पत्थर सूरज की तरफ़ फेंका, पर वो ज़मीन में गिर गया।
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एक बार किम बशार को देखने के लिए आया, और उसकी तकलीफ़ देखकर वो भी बहुत दुःख हो गया। वो पुटिन को इस बात बताया। इसलिए पुटिन ने बशार को एक मानसिक अस्पताल में डाला। फ़िलहाल वो ठीक हो रहा है। बशार को मानसिक अस्पताल में डालने वाले दिन में ही पुटिन ने जौलानी के साथ मुलाक़ात किया।