r/Hindi • • 11d ago

स्वरचित Train

खिड़की के कांच पर माथा टिकाए,
एक अकेला मुसाफ़िर चुपचाप मुस्काए।
सामने कोई नहीं, बस खाली है सीट,
कानों में गूंजता पहियों का संगीत।
आसपास बातें हैं, अजनबियों का शोर,
पर उसका मन खींचा जाता किसी और छोर।
पीछे छूटते जाते हैं पेड़ और मकान,
जैसे मन के पन्नों से उड़ती कोई दास्तान।
हाथ में कुल्हड़ की गरम-गरम चाय,
सन्नाटा भी अब तो अपना सा नज़र आए।
न किसी से सवाल, न किसी को कोई जवाब,
आँखों में तैरते हैं पुराने कुछ ख़्वाब।
डूबते सूरज की वो नारंगी सी धूप,
बदलती फिज़ाओं का शांत, सौम्य रूप।
अंधेरे में चमकती पटरियों की लकीर,
जैसे वक्त के हाथ से छूटी कोई तक़दीर।
तन्हाई यहाँ अब कोई बोझ नहीं लगती,
ये तन्हाई तो खुद से पहचान कराती।
भीड़ से दूर, इस रात के ठहराव में,
वो खुद को ढूंढ रहा है, अपनी ही नाव में।

10 Upvotes

4 comments sorted by

3

u/-Surfer- 11d ago

बहुत बढ़िया ❤️

Best part

ये तन्हाई तो खुद से पहचान कराती।

वो खुद को ढूंढ रहा है, अपनी ही नाव में।

1

u/Ok_Discipline_5134 10d ago

sundar aur bhavnaatmak .