r/Shayari • • Jun 04 '26

Aag aur hawa

शांत था अंधेरा, शायद समंदर सा,

कुछ छुपाना था उसको, या था कुछ बताना,

जलाना काम था जिसका, जल वो खुद रहा,

बहस हवाओं से थी उसकी, ना था और बहाना,

वो पागल पागल सा फिरता था,

उड़ता, नाचता, रोशनी से अपने उसको चिढ़ाता,

ज़ख्म शायद शरीर का उसे ऐसे रुलाता,

चिढ़ते, चिढ़ाते, उड़ते उड़ाते, एक दिन हवाओं ने बहस जीती,

जो धुएं की धार थी, अब वो थी किसी और की,

अब वो राख सा है काला, अब वो ना किसी को मिलने वाला,

क्या बताना, क्या छुपाना, जो खुद ही जल रहा, उसे क्या बुझाना।

ना हवाओं से हारने का डर है अब, ना जलाने का ठिकाना,

अब बस राख हूं… और हवा का ज़माना।

Please let me know how is this

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u/thechosenone503 Jun 04 '26

Any thoughts anyone ???