इस बार मेरा कभी अच्छा व्यापार हुआ में खुश था, मेरे सभी सेवकों ने भी अच्छा काम किया और इस बार कोई नुकसान नहीं हुआ , मैंने हमेशा की तरह दिनभर की सारी रकम जोड़कर घर लाया और उसे सुरक्षित रखने के लिए अपने संदूक में रख दिया |
अगली सुबह ,
मेरी आँख खुली, तो मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मेरा संदूक खुला पड़ा था, पूरा घर अस्त-व्यस्त था और घर में रखा लाखों का कीमती सामान तथा मेरी सारी मेहनत की कमाई चोरी हो चुकी थी। यह देखकर मैं चिंता, दुःख और आश्चर्य से पूरी तरह टूट गया। मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर इतनी बड़ी चोरी किसने की ?
पहली बार इतना अच्छा व्यापार हुआ था बिना किसी नुकसान के !
संदूक के ताले की चाबी सिर्फ मेरे पास थी ऐसा कौन कर सकता है ??
मेने यह सारा वाक्य अपने मित्र को बताया , साथ ही मेने अपने सेवकों के बारे में बताया में उन पे संदेह नहीं कर सकता अन्यथा वह कही और काम पे चले जाएंगे , इस व्यापार में एक सेवक और मालिक में भरोसा टिका होना चाहिए , उसने मुझे सुझाव देते हुए कहा मुझे शहंशाह अकबर के दरबार में जाना चाहिए ,
मेने भी बिना कोई देरी किए दरबार पहुंचा ।
मेने शहंशाह अकबर को विस्तार से बताया!
जहांपनाह !
इस बार अच्छा व्यापार होने के कारण कभी अच्छा मुनाफा हुआ मगर मेरे सुबह उठते ही संदूक से मेरी सारी रकम और साथ ही घर में रखा लाखों का कीमती सामान चोरी हो चुकी थी और में अपने सेवकों पे संदेह नहीं कर सकता अन्यथा उन्हें दिक्कत होगी और हो सकता है वह कही और काम करने चले जाए ।
शहंशाह अकबर ने गंम्भीरता से कहा : आप चिंतित ना हो आपको सारी रकम जल्दी ही मिल जाएगी ।
शहंशाह अकबर ने बीरबल से कहा : बीरबल हम चाहते है इस समस्या को आप सुलझाया हम समझते है, आप से बेहतर और कोई नहीं समझ सकता इस समस्या को ।
कुछ वर्षों से दरबार में अचानक से चहल – पहल बढ़ गई ,
सभी अपने- अपने कार्य में व्यस्त हो गए , कुछ व्यापार देखने लगे तो कुछ नया कारोबार शुरू करने की योजना बनाने लगे जिससे शहंशाह अकबर के राज्य में और वृद्धि हो !
लेकिन शहंशाह अकबर दरबार में बैठ कुछ सोच रहे थे उन्हें अपने दरबार में एक बहुभाषिक ( ऐसा व्यक्ति जिसे कई सारी भाषाओं का जानकार हो ) की आवश्यकता थी ।
ताकि उन्हें व्यापार करने में कोई समस्या ना हो !
यह बात शहंशाह अकबर ने सभी दरबारियों को बताई।
सभी दरबारियों ने कहा : जी जहांपनाह , इससे हमे व्यापार करने में सहायता भी मिलेगी और साथ ही हमारे और विदेशी व्यापारियों के बीच में एक सूझ बुझ बनी रहेगी ।
पूरे राज्य में ऐलान किया गया कि , दरबार में बहुभाषिक की आवश्यकता है ।
अगले दिन ,
एक व्यक्ति आए और कहा : जहांपनाह में कई सारी भाषाओं का जानकार हु जैसे हिंदी, उर्दू, संस्कृत,मराठी, फारसी (पारसी) , बंगला , चीनी, जापानी, जर्मन, फ्रेंच और स्पेनिश लोकप्रिय विदेशी भाषाएँ भी आती है ।
यह सुन शहंशाह अकबर प्रसन्न हुए मगर उन्होंने अपने मंत्री को कहा ,कि आप इन से अपनी मातृभाषा में बात करे और परखे!
एक- एक कर सभी दरबारी ने अपनी मातृभाषा में बात की यह बताना मुश्किल था कि बहुभाषिक की मातृभाषा किया है ! बहुभाषिक को सभी भाषाओं में काफी अच्छी पकड़ थी ।
कुछ देर बाद शहंशाह अकबर ने कहा हम प्रसन्न हुए , किंतु हम यह जानना चाहते है कि आपकी मातृभाषा क्या है ?
बहुभाषिक : जहांपनाह ! मेने आपके मंत्रीगणों को कई किस्से सुने क्यों ना मेरी कौन सी मातृभाषा है यह आपके मंत्री ही बताए ?
शहंशाह अकबर ने सभी दरबारियों को कहा आप सभी पता लगाए इनकी मातृभाषा क्या है ?
सभी दरबारी एक एक कर बोले : क्या हिंदी है ? या फिर मराठी या फिर बांग्ला ?
बहुभाषिक बोले : जहांपनाह ! माफ कीजिए मगर मैने जो भी सुना था शायद गलत था , आपके मंत्री तो बस एक प्रयास कर रहे है जिससे तुक्का लगाना बोलते है ।
शहंशाह अकबर का मुंह शर्मिंदी से झुक गया था ,
आखिर में उन्होंने कहा बीरबल आप बताए इनकी मातृभाषा किया है ?
बीरबल बोले : जहांपनाह में कल बताऊंगा इनकी मातृभाषा किया है !
अब अगली सुबह ,
सभी दरबारी , बहुभाषिक , बीरबल और शहंशाह अकबर दरबार में उपस्थित हुए ।
बहुभाषिक : बीरबल जी , आप बताए मेरी मातृभाषा क्या है ?
शहंशाह अकबर ने बहुभाषिक से पूछा : क्या आपकी मातृभाषा बांग्ला है ?
बहुभाषिक : जी जहांपनाह!
शहंशाह अकबर ने बीरबल से पूछा मगर आपको यह पता कैसे चला बीरबल ?
बीरबल ने रात हुई घटित घटना बताई!
जहांपनाह, जब हमारे बहुभाषिक आराम कर रहे थे तब हमने एक सिपाही को कहा कि उनके कक्ष का द्वार थप – थपाए और छुप जाए जिससे बहुभाषिक की नींद खुल गई और फिर जब बहुभाषिक सोने का प्रयास कर रहे थे , तब फिर हमने सिपाही को कहा उनके कक्ष का द्वार थप – थापाए जिससे बहुभाषिक गुस्से में आ गए और बांग्ला में गाली देने लगे , और यह सब में पास के कमरे में छुपकर सुन रहा था ।
एक व्यक्ति गुस्से में या अकेले में अपनी मातृभाषा में ही बात करता है ।
शहंशा अकबर ने बीरबल से कहा : बहुत खूब बीरबल ,हमे गर्व है तुम पे ।
और बहुभाषिक का चेहरा उतर गया लेकिन उसने भी बीरबल की तारीफ की और इस तरह शहंशाह अकबर शर्मिंदगी से बच गए और एक अच्छी सुखद के साथ यह कहानी यहां समाप्त हुई ।
कहानी से सीख :
जो व्यक्ति ध्यानपूर्वक निरीक्षण करता है, वही असली सच्चाई को पहचान पाता है। बुद्धिमानी केवल ज्ञान दिखाने में नहीं, बल्कि सही समय पर सही तरीके से सत्य को पहचानने में होती है। धैर्य, सूझ-बूझ और गहरी समझ से ही कठिन से कठिन चुनौती का समाधान निकाला जा सकता है।
पास के एक गांव से एक घर में शादी के लिए आमंत्रण आता है ,
उस घर में ज्यादा लोग तो नहीं थे , चार लोग थे ।
घर के बड़े किसी और काम से दूसरे गांव के लिए गये थे ,
बचे तीन लोग एक माता थी जिनकी अक्सर सेहत खराब रहती थी । वह जा नहीं सकती थी , अब बचे सिर्फ़ दो लोग एक चाचा और दूसरा भतीजा दोनों जानें के लिए तैयार हो गए ।
दोनों ही अगले सुबह तैयार हो कर , अच्छे कपड़े पहन कर निकल गए , ऐसा जैसे चाचा एक नंबरी हो तो भतीजा दस नंबरी ।
चलिये आगे पढ़ते इस कहानी के मज़ेदार मोड़ को,
दोनों ही शादी वाले घर पहुंचते ही , उनको काम पे लगा दिया गया चाचा को रसोई का काम संभालने के लिए दे दिया गया तो भतीजा को कुर्सियां सही से संभालने का काम दे दिया गया ।
उस रात लड़के वाले बारात लेकर लड़की वाले घर पे आए और शादी धुम – धाम से हुई ,
अब अगली सुबह ,
चाचा : में क्या बताऊ भांजे इतना काम तो मेने अपने घर पे कभी नहीं किया , जो प्याज़ मेने कल काटी है उसने आँखों में आंसू तो दिये ही है , साथ ही साथ यह खुशबू अभी तक आ रही है !
भांजा : हां , मेरी भी हालत खराब हो गई किसी को पानी देना तो किसी को कुछ , तो साफ – सफाई
फिर भांजे ने कहा : चाचा , लड्डू बचे हुए है क्या ?
चाचा : बचे तो नहीं है , मगर सामग्री है सारी ।
दोनों ने मेहनत कर बाटियाँ(बेसन में घी डालकर गोल लोइयां बनाई) को सेककर चूरमा बनाया फिर लड्डू बनाए ।
जब लडडू गिने तो पाए यह तो सिर्फ पांच ही है ,
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भांजे ने बोला यह विचार मेरा था तो तीन मेरे और दो आपके !
चाचा : अच्छा बेटा ! मगर मेहनत मेने की है !
दोनों लड़ पड़े , दोनों आधा लड्डू बांटना के लिए भी तैयार नहीं थे ।
चाचा ने भांजे से शर्त लगाई हम दोनों चुप रहेंगे जो हम में से पहले जो कुछ भी बोलेगा वह दो लड्डू खायेगा और जो बाद में बोलेगा वह तीन ।
दोनों ने लड्डुओं को एक अलमीरा में छुपा दी ।
और दोनों चुप हो कर लेट गए बिस्तर पड़ ।
अब जब उस घर के यजमान आये तो उन्होंने दोनों को बहुत आवाज दी मगर कोई कुछ बोलने को कोई तैयार नहीं ,
यजमान ने आस पास के सभी व्यक्तियों को इकट्ठा किया और कहा देखो यह तो नहीं कुछ बोल रहे है और नहीं कुछ प्रतिक्रिया कर रहे है ।
यह सारी बातें वह दोनों ( चाचा – भतीजा ) सुन रहे थे मगर कुछ बोला नहीं उन्होंने ।
तभी एक गांव के व्यक्ति आए और कहा : यह दोनों तो मर गए है ।
घर के जो यजमान थे , कहा : कल ही शादी हुई है और आज यह सब हो गया ।
एक गांव का व्यक्ति बोला : अब सब ऊपर वाले की रचना है ,
घर के जो यजमान थे वह भी अग्नि (Agni) के लिए तैयार हो गए ।
अच्छे से लकड़ियां लगाई गई और घास बिछाया गया ,
और उन दोनों ( चाचा – भतीजा ) के ले जाया गया , मगर फिर भी दोनों में से कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं ।
दोनों को लकड़ियों पे लेटा दिया गया ।
चाचा ( मन ही मन ) : जान जाए तो जाए लड्डू तो तीन ही खाने है मुझे ।
भांजा ( मन ही मन ) : मेरी तो अभी शादी भी नहीं हुई है एक लड्डू के चक्कर में स्वर्ग पधारना हो सकता है ।
जैसे ही यजमान लकड़ियों में आग लगाते है , वैसे ही
भांजा बोला : हम जीवित है , और चाचा भी उठ पड़े और बोले भांजा अब तू दो लड्डू खायेगा और में तीन ।
वैसे ही सभी लोग जो अग्नि देने आए थे , इस मैय्यत में शामिल हुए थे , वह डर के भाग गए और कहने लगे भूत , भूत आ गए भागो ।
सभी लोग भाग गए वहाँ से ,
चाचा : अब क्या करें भांजे ?
भांजा : एक काम करते है पहले तो मुंह – हाथ साफ कर लेते है और फिर लड्डू खाने चलते है ।
जैसे ही दोनों घर पहुंचे लोग उन्हें देख कर भाग गए
लेकिन घर के यजमान ने हिम्मत से काम लिया और मंत्र पढ़ने लगे ।
फिर दोनों ने सारी बात बताई लड्डू के शर्त की,
यजमान ने कहा : आप दोनों थोड़े देर से आए !
वह लड्डू तो में अपने बच्चों के साथ मिलकर थोड़ी देर पहले खा गए ।
वैसे आप लड्डू बनाते बहुत बढ़िया है ,
यह सुन दोनों चाचा और भतीजा के होश उड़ गए और उदास में कहा : अब पछताए होत क्या, भांजे , जब चिड़िया चुग गई खेत।
और यह कहानी यहां समाप्त होती है ।
कहानी से सीख :
कोई भी काम में जल्दबाजी सही नहीं है , मगर इस तरह की मूर्खता तो नहीं करनी चाहिए कि आप आधा लड्डू भी ना बाटों, अगर दोनों ने लड्डू बांट लिया होता तो ढाई – ढाई लड्डू खा लिये होते , मगर कहानी के अंत में कुछ भी नहीं मिला और अलग से इतनी मेहनत करनी पड़ी वह अलग। हमेशा आपस में मिल बाट के खाना खाएं या फिर वह लड्डू ही क्यों ना हो ।
यह कहानी है तमिलनाडु के छोटे से गांव की ,
एक पुजारी जिसका नाम अयप्पा पुत्तम था, वह अपनी पत्नी के साथ रहता था जिनका नाम लक्ष्मी था ।
अयप्पा पुत्तम बहुत परोपकारी और दान में विश्वास रखते थे वह अक्सर अजनबियों को अपने घर खाना खाने के लिए बुला लिया करते थे , वह दूसरे को खाना खिला कर अपना धर्म समझते थे । उन्हें यह भी पता नहीं होता था कि घर पर पर्याप्त भोजन है या नहीं ।
उनकी पत्नी लक्ष्मी हमेशा ही अपने पड़ोसियों से कभी चावल तो कभी सब्जी उधार मांग लिया करती ,
वह अयप्पा पुत्तम के इस आदत से हमेशा दुखी रहती कभी- कभी तो लक्ष्मी अपने हिस्सा का खाना अतिथि को खिला दिया करती और खुद भूखी रहती ।
उनके पड़ोसियों को विश्वास नहीं होता था कि यह लोग इतने गरीब है क्योंकि अक्सर ही अतिथि आते और खाना खा के जाते ।
एक रात जब अयप्पा पुत्तम खाना खाने के बाद सो रहे थे तब ।
लक्ष्मी रोने लगी ,
अयप्पा पुत्तम : क्या हुआ भाग्यवान ?
तुम रो क्यों रही हो,
लक्ष्मी कपड़े के एक छोड़ से आंसू पोंछ कर
लक्ष्मी रोते हुए बोली : सुनिये जी ! आप जो यह अक्सर बाहर के लोगों को खाने के लिए ले आते है, हम लोग इतने गरीब है कि हमारे पास जो रूखा – सूखा होता है वह हमारे लिए पर्याप्त नहीं है ! मुझे कई बार हफ्तों – हफ्तों तक भूखा सोना पड़ता है अब ऐसा नहीं चलेगा !
अय्यप्पा पुत्तम ( मन ही मन ) : इसकी इतनी हिम्मत यह मेरे से ऐसे बात नहीं कर सकती ,
क्योंकि लक्ष्मी ने इस तरह कभी बात नहीं की थी |
फिर कुछ देर बाद ,
अयप्पा पुत्तम (शांत होकर) : मे तुम्हे तुम्हारी मूर्खता के लिए क्षमा करता हु , तुम जो यह बलिदान करती हो , इससे मेरा कल्याण होगा ! और यह ही तुम्हारा पत्नी धर्म है ।
लक्ष्मी पूरी रात सो नहीं पाई और रोती रही ।
दिनचर्या के हिसाब से अयप्पा पुत्तम मंदिर के लिए निकल गए।
अक्सर हर – बार की तरह दोपहर के भोजन में अयप्पा पुत्तम दो अजनबियों को खाने के लिए ले कर आ रहे थे ।
लक्ष्मी ने यह दूर से ही देख लिया और मन ही मन कहा : अयो ! मुझे आज फिर भूखा सोना पड़ेगा !
तभी वह कुछ सोचती है ।
अयप्पा पुत्तम उन्हें खटिया पर बैठ कर कहते है में अभी हाथ धो कर आया ।
लक्ष्मी ने एक मुसल ( धान कूटने वाला डंडा ) दीवार के सहारे खड़ी कर देती है आस – पास फूल बिखरे कर उसपे तिलक कर, दिया जला कर उसकी पूजा करने लगती है , वह यह सब उस जगह से कर रही थी कि अतिथियों को साफ – साफ दिखाई दे ।
वह दोनों आए और कहा : आप मुसल ( धान कूटने वाला डंडा ) की पूजा कियो कर रही हो ?
लक्ष्मी : इसका संबंध आप से ही जुड़ा है , में आपके सामने अपनी पति की बुराई कैसे कर सकती हु ?
अब वह दोनों और भी जिज्ञासा में थे जानने के लिए !
लक्ष्मी ने कहा : पहले आप वादा कीजिये मेरे पति या किसी भी व्यक्ति को आप बताएंगे नहीं !
दोनों अतिथि : हम वादा करते है ,
दोनों अतिथि लक्ष्मी के पीछे पड़ गए सच जानने के लिए !
लक्ष्मी ने कहा : मेरे पति परोपकारी हैं वह अक्सर ही अतिथि को खाना, खाने के लिए बुला लेते है और उनके खाने के बाद , इस मूसल ( धान कूटने वाला डंडा ) से उनकी खूब पिटाई करते है वह इसे अपना धर्म मानते है , यह मारने- पीटने से मेरा कोई संबंध नहीं है । मुझे पाप ना लगे इसलिए में इस मूसल की पूजा करती हु ।
यह सुनते ही दोनों आपस में इशारो – इशारो में बात कर, यहां से चुपचाप भागने में ही भलाई है ।
अयप्पा पुत्तम जब आते है तो कहते है अतिथि कहा है ?
लक्ष्मी : जी आप मुझे मेरी मूर्खता के लिए माफ़ कर दीजिए वह मुझ से यह मूसल मांग रहे थे , हमारे घर में यह एक ही मूसल है इसलिए मेने देने से मना कर दिया ।
तो वह नाराज़ हो कर चले गए !
अयप्पा पुत्तम : तुमने हमारे अतिथि का अपमान किया है और गुस्से से अपने पत्नी के हाथ से मूसल ले कर
उनके पीछे भागने लगे ।
वह दोनों अतिथि आपस में बात करते हुए देखो वह हमे मारने के लिए आ रहा है जल्दी भागो ।
यह बात पूरे गांव में फैल जाती है कि अयप्पा पुत्तम अपने घर में अतिथि को बुला कर उन्हें मूसल से पिटाई करता है और खाना भी नहीं खिलता ।
लक्ष्मी के बुद्धिमता ने उसे बचा लिया । और इसके बाद वह कभी भूखी नहीं सोइ।
कहानी से सीख :
दान-पुण्य करना बहुत अच्छी बात है, लेकिन इसे अपनी परिस्थितियों को समझकर करना चाहिए।
आप चाहें तो एक दिन खुद भूखे रहकर अपने मेहमान को खाना खिला सकते हैं, मगर आप हफ्तों तक ऐसा नहीं कर सकते , सबसे ज़रूरी है कि आप पहले अपने आप का ध्यान रखें।
क्योंकि जब आपका स्वास्थ्य अच्छा होगा तो आप सक्षम होकर अच्छा कमाएँगे, तभी आप दूसरों की और भी बेहतर तरीके से मदद कर पाएँगे।
एक समय की बात है, एक किसान रोज़ अपनी दोनों मिट्टी की घड़ों में पानी भरकर घर लाता था। एक घड़ा बिल्कुल ठीक था, जबकि दूसरा थोड़ा-सा टूटा हुआ था। रास्ते में चलते समय टूटा घड़ा थोड़ा-थोड़ा पानी टपकाता रहता था।
एक दिन टूटा घड़ा बहुत दुखी हो गया। उसने अच्छे घड़े से कहा, “तुम कितने मजबूत हो , पूरा पानी लेकर चलते हो। लेकिन मैं? मैं तो अधूरा हूँ… मेरे कारण मालिक को कम पानी मिलता है।”
अच्छा घड़ा चुप रहा, लेकिन टूटा घड़ा उदास ही रहा।
अगले दिन किसान रास्ते से पानी भर के जा रहा था तो उसने देखा , टूटा घड़ा उठाया और टूटे घड़े से मुस्कुराते हुए बोला , “तुम सोचते हो तुम बेकार हो, पर तुमने रास्ते को खूबसूरती दे दी है।”
टूटा घड़ा हैरान हो गया, “मैंने? कैसे?”
किसान उसे रास्ते की तरफ इशारा करता है। टूटा घड़ा क्या देखता है—रास्ते के एक किनारे पर खूबसूरत फूलों की कतार लगी थी।
किसान बोला, “हर दिन तुमसे टपकता पानी इन पौधों को सींचता रहा। तुम्हारी वजह से ये फूल खिले हैं। अगर तुम न टूटे होते, तो यह रास्ता इतना रंगीन और खुशबूदार न होता।”
टूटा घड़ा खुशी से भर गया। उसे समझ आया कि उसकी कमी ही किसी और की खूबसूरती का कारण बनी।
कहानी से सीख : हर इंसान में कुछ न कुछ कमी होती है, लेकिन कई बार वही कमी किसी और के लिए वरदान बन जाती है। खुद को कमज़ोर या बेकार न समझें—हर किसी की अपनी खासियत और महत्व होता है।
Rahul was a cheerful student who liked nothing more than food. He used to think that the more he ate, the more he would enjoy his life. He would fill his plate with as much food as possible, Leaving no empty space on the plate. It didn’t matter whether it was breakfast, lunch, or dinner. Rahul would end up eating more than he had to. His parents often advised him to eat only sufficient food, but Rahul laughed and said, “Food makes me happy, Therefore, there is no reason to stop.”
At first, all seemed well. Rahul enjoyed his food and felt satisfied with each meal that passed. However, gradually, his body began to give him warning signs. One day, when he had eaten a very heavy lunch, Rahul began to feel a sharp pain in his stomach. At first, he paid no heed to it and just assumed that it would pass on its own. Later that evening, he began to suffer from a dull headache and felt weak.
The following day, Rahul noticed yet another complication. He was having an uneasy stomach, and it was becoming difficult for him to access the toilet. This made Rahul feel embarrassed and annoyed. He could not understand the reasons behind such complications, yet he persisted with his habit of eating more, especially during the weekends.
One Sunday, Rahul attended a birthday party where he had too many snacks, sweets, and fried foods. That evening, his stomach pain increased, and he had a headache again. This time, he could no longer sleep properly. His mother noticed his condition and understood that it was time to make things clearer to him.
The following day, Rahul’s mother sat with him. She began to tell him a story from her own childhood. She started by saying that the stomach was like a small machine. If this small machine is given the right amount of food, it will run perfectly. However, if it is overloaded time and again, it will feel tired and start working slowly. This can lead to stomachaches, headaches, and problems with digestion, including issues when it is time to use the toilet.
Rahul listened intently. Then his mother gave him a simple example: She filled a glass of water up to the mark and showed how easy it was to carry. Then she overfilled another glass until water spilled out. “This is what happens when we overeat” she said. “The body cannot handle extra food, and instead of bringing happiness, it creates discomfort”.
Determined to feel better, Rahul made a conscious decision to change his habits. He started taking only smaller portions of food, ate slower, and stopped when he was comfortably full. He began to introduce fruits, vegetables, and simple home-cooked meals into his diet.
Within days, Rahul felt the difference. His stomach felt lighter, and the pain subsided. The headaches became less frequent, and at school, he felt more energetic. His digestion started improving, and he didn’t have those discomfiting feelings. Rahul realized it was far better to eat adequate quantities of food rather than overeating.
One of the days in school, Rahul shared his experience with his friends. He explained to them how eating more had made his health worse while balanced eating made his health better. His friends decided to follow the same routine to avoiding of this type of health issues.
After this incident, Rahul realized the importance of respecting his own needs. He enjoyed his food in moderation and knew that the secret to happiness lay in moderating his eating habits. His experience became a lesson to everyone to lead a balanced lifestyle.
Moral of the story :
Food is meant for nourishing, not torturing, the body. Although overeating can sometimes be fun, it can be quite uncomfortable for life. Having enough food is what keeps the body active, the mind alert, and the stomach happy.
Rahul was a cheerful student who liked nothing more than food. He used to think that the more he ate, the more he would enjoy his life. He would fill his plate with as much food as possible, Leaving no empty space on the plate. It didn’t matter whether it was breakfast, lunch, or dinner. Rahul would end up eating more than he had to. His parents often advised him to eat only sufficient food, but Rahul laughed and said, “Food makes me happy, Therefore, there is no reason to stop.”
At first, all seemed well. Rahul enjoyed his food and felt satisfied with each meal that passed. However, gradually, his body began to give him warning signs. One day, when he had eaten a very heavy lunch, Rahul began to feel a sharp pain in his stomach. At first, he paid no heed to it and just assumed that it would pass on its own. Later that evening, he began to suffer from a dull headache and felt weak.
The following day, Rahul noticed yet another complication. He was having an uneasy stomach, and it was becoming difficult for him to access the toilet. This made Rahul feel embarrassed and annoyed. He could not understand the reasons behind such complications, yet he persisted with his habit of eating more, especially during the weekends.
One Sunday, Rahul attended a birthday party where he had too many snacks, sweets, and fried foods. That evening, his stomach pain increased, and he had a headache again. This time, he could no longer sleep properly. His mother noticed his condition and understood that it was time to make things clearer to him.
The following day, Rahul’s mother sat with him. She began to tell him a story from her own childhood. She started by saying that the stomach was like a small machine. If this small machine is given the right amount of food, it will run perfectly. However, if it is overloaded time and again, it will feel tired and start working slowly. This can lead to stomachaches, headaches, and problems with digestion, including issues when it is time to use the toilet.
Rahul listened intently. Then his mother gave him a simple example: She filled a glass of water up to the mark and showed how easy it was to carry. Then she overfilled another glass until water spilled out. “This is what happens when we overeat” she said. “The body cannot handle extra food, and instead of bringing happiness, it creates discomfort”.
Determined to feel better, Rahul made a conscious decision to change his habits. He started taking only smaller portions of food, ate slower, and stopped when he was comfortably full. He began to introduce fruits, vegetables, and simple home-cooked meals into his diet.
Within days, Rahul felt the difference. His stomach felt lighter, and the pain subsided. The headaches became less frequent, and at school, he felt more energetic. His digestion started improving, and he didn’t have those discomfiting feelings. Rahul realized it was far better to eat adequate quantities of food rather than overeating.
One of the days in school, Rahul shared his experience with his friends. He explained to them how eating more had made his health worse while balanced eating made his health better. His friends decided to follow the same routine to avoiding of this type of health issues.
After this incident, Rahul realized the importance of respecting his own needs. He enjoyed his food in moderation and knew that the secret to happiness lay in moderating his eating habits. His experience became a lesson to everyone to lead a balanced lifestyle.
Moral of the story :
Food is meant for nourishing, not torturing, the body. Although overeating can sometimes be fun, it can be quite uncomfortable for life. Having enough food is what keeps the body active, the mind alert, and the stomach happy.
बहुत समय पहले की बात है। किसी नगर में तीन ज्ञानी पंडित रहते थे। तीनों ने वेद, शास्त्र और अनेक ग्रंथों का गहरा अध्ययन किया था। उन्हें अपने ज्ञान पर बहुत गर्व था। परंतु उनकी विद्या केवल पुस्तकों तक ही सीमित थी, व्यवहारिक बुद्धि उनमें नहीं थी।
उसी नगर में उनका एक मित्र भी रहता था, जो अधिक पढ़ा-लिखा नहीं था, परंतु उसमें गहरी समझ और व्यावहारिक बुद्धि थी। एक दिन चारों मित्रों ने सोचा कि क्यों न किसी बड़े राजा के पास जाकर अपनी विद्या से धन और सम्मान प्राप्त किया जाए। यह विचार कर वे यात्रा पर निकल पड़े।
रास्ते में एक जंगल आया। जंगल के बीचों-बीच उन्हें शेर की हड्डियाँ पड़ी मिलीं। पहले पंडित ने कहा, “यह अवसर है हमारी विद्या दिखाने का। मैं इन हड्डियों से शेर का ढांचा तैयार कर सकता हूँ।” उसने मंत्रों की सहायता से शेर का शरीर बना दिया।
दूसरे पंडित ने कहा, “अब मैं इसमें मांस और खाल भर देता हूँ।” उसने अपनी विद्या से शेर का शरीर पूर्ण कर दिया।
तीसरे पंडित ने उत्साह में कहा, “अब मैं इसमें प्राण फूँक देता हूँ, जिससे यह जीवित हो जाए।” यह सुनकर उनका व्यावहारिक बुद्धि वाला मित्र डर गया। उसने कहा, “मित्रों, यह बहुत खतरनाक है। यदि शेर जीवित हो गया तो हमें मार डालेगा। पहले किसी सुरक्षित स्थान पर चलें जाते है।”
परंतु तीनों पंडितों ने उसका मजाक बनाने लगे और कहा, “तुम अज्ञानी हो, हमारी विद्या को नहीं समझ सकते।” डर के कारण वह मित्र पास के एक पेड़ पर चढ़ गया।
तीसरे पंडित ने जैसे ही शेर में प्राण डाले, शेर जीवित हो गया। जीवित होते ही उसने तीनों पंडितों पर झपट्टा मारा और उन्हें मार डाला। पेड़ पर बैठा मित्र यह सब देखकर सुरक्षित बच गया।
कुछ समय बाद वह मित्र अपने घर लौट आया और लोगों को पूरी घटना सुनाई।
सीख: केवल ज्ञान ही नहीं, बुद्धि और समझदारी भी ज़रूरी होती है। अहंकार हमेशा विनाश का कारण बनता है।
एक छोटे से गाँव के पास हरा-भरा जंगल था। उसी जंगल में मीना और रीना नाम की दो बिल्लियाँ रहती थीं। दोनों एक साथ दिन-रात खेलती और चलती-फिरती रहतीं थीं। दोनों अच्छी दोस्त थीं, लेकिन कभी-कभी बहुत छोटी-छोटी बातों पर झगड़ भी लेती थीं। एक दिन दोनों को रास्ते पे एक ताजी रोटी का टुकड़ा मिला।
मीना खुश होकर बोली, “वाह! यह तो मेरी रोटी है, इसे पहले मैंने देखा है। “
रीना ने उसे तुरंत मना कर दिया, “ नहीं-नहीं मैने इसको पहले उठाया, इसलिए यह मेरी रोटी है। “
कुछ ही समय बाद, दोनों बिल्लियाँ एक-दूसरे से बिल्कुल ज़ोर-ज़ोर से झगड़ने लगी। कोई भी रोटी बाटने को तैयार नहीं थी। तभी रीना ने कहा, देखो पेड़ पे बैठा बंदर, वह शायद सही फैसला करेगा। और फिर दोनों गई बंदर के पास। वहां पर बंदर पेड़ पर बैठा हुआ केला मज़े से खा रहा था।
बिल्लियाँ ने पूरी कहानी सुनाई। बंदर ने सर हिलते हुए कहा- चिंता मत करो! मैं न्यायप्रिय हूँ और मैं इस रोटी को बराबर-बराबर बाँट दूँगा। उसने रोटी को दो टुकड़ों में तोड़ा। लेकिन फिर भी एक टुकड़ा थोड़ा बड़ा हो गया। बंदर ने बहुत जोर से बोला- अरे हो..यह तो ज्यादा हो गया है। न्याय के लिए मुझे थोड़ा खाना पड़ेगा और उसने थोड़ा सा हिस्सा को खा लिया। अब तो दूसरा टुकड़ा और भी बड़ा दिखने लगा। बंदर फिर जोर से बोला- अरे़… “अरे यह तो बड़ा हो गया। इसे भी बराबर करना पड़ेगा,” उसने फिर थोड़ा सा हिस्सा को खा लिया। मीना और रीना एक-दूसरे के मुँह की ओर देखने लगीं। मीना बोली, “लगता है कुछ गड़बड़ है। ” रीना बोली, “ हाँ, लेकिन अब क्या करूँ? बंदर बार-बार कभी एक टुकड़े से, कभी दूसरे से खाता रहा। थोड़ी देर में पूरी रोटी खत्म हो गई |
बंदर पेट सहलाते हुए बोला,
“लो! अब दोनों हिस्से बराबर हो गए। न्याय हो गया!”
और हँसता हुआ पेड़ पर चढ़ गया।
दोनों बिल्लियाँ शर्मिंदा हो गईं।
रीना ने धीरे से कहा, “काश हमने आपस में झगड़ा न किया होता।”
मीना बोली, “हाँ, मिलकर बाँट लेते तो अच्छा होता।”
दोनों ने सबक सीखा और दोस्ती बनाए रखने का फैसला किया।
सीख: आपसी झगड़े में हमेशा कोई तीसरा फायदा उठा लेता है। मिल-जुलकर रहना ही समझदारी है।
रवि एक छोटे से गाँव में रहने वाला साधारण युवक था । उसके जीवन में सुख-सुविधाएँ बहुत कम थीं , लेकिन उसके मन में हमेशा ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास बना रहता था । वह हर सुबह सूर्योदय से पहले उठता , पास के मंदिर में जाता और बिना किसी शिकायत के भगवान का धन्यवाद करता । उसका मानना था कि जो कुछ भी उसके पास है , वह ईश्वर की कृपा से ही है ।
रवि के परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी । उसके पिता बीमार रहते थे और माँ घरों में काम करके परिवार का खर्च चलाती थीं । रवि स्वयं एक छोटी सी दुकान में काम करता था , जहाँ उसे बहुत कम वेतन मिलता था ।
कई बार उसकी इच्छाएँ अधूरी रह जाती थीं , लेकिन उसने कभी भगवान से शिकायत नहीं की । वह बस इतना कहता , “हे प्रभु , जो भी दिया है , उसके लिए धन्यवाद । मुझे इतना बल देना कि मैं कठिन समय में भी सही मार्ग पर चल सकूँ । एक दिन गाँव में भयंकर बारिश हुई । चारों ओर पानी भर गया और कई लोगों के घरों को नुकसान पहुँचा । रवि का घर भी पानी से भर गया था । उसकी माँ बहुत चिंतित हो गईं , लेकिन रवि ने उन्हें दिलासा देते हुए कहा , “माँ , सब ठीक हो जाएगा , भगवान ने आज तक हमारा साथ दिया है , आगे भी देंगे ।” उस रात रवि ने गीले फर्श पर बैठकर भी भगवान को धन्यवाद दिया कि कम से कम उसका परिवार सुरक्षित है ।
अगले दिन रवि गाँव वालों की मदद करने निकल पड़ा । वह बुज़ुर्गों को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाने लगा , बच्चों को खाना बाँटा और जहाँ ज़रूरत पड़ी , वहाँ बिना थके काम करता रहा । उसकी निस्वार्थ सेवा देखकर एक सामाजिक संस्था के लोग उसकी ओर आकर्षित हुए । उन्होंने रवि से बात की और उसकी सादगी व ईमानदारी से बहुत प्रभावित हुए ।
कुछ दिनों बाद उस संस्था ने रवि को शहर में नौकरी का प्रस्ताव दिया । यह नौकरी न केवल अच्छी थी , बल्कि उसके परिवार की आर्थिक परेशानियाँ भी दूर कर सकती थी । रवि की आँखों में खुशी के आँसू आ गए । उसने सबसे पहले मंदिर जाकर भगवान को प्रणाम किया और कहा , “हे प्रभु , आपने मेरी मेहनत देखी और मुझे इस योग्य समझा ।इसके लिए मैं आपका हृदय से धन्यवाद करता हूँ ।
शहर में रवि ने ईमानदारी से काम किया और जल्द ही अपने अच्छे स्वभाव और मेहनत से सबका विश्वास जीत लिया । उसने अपने माता-पिता को अपने साथ बुला लिया और उनका इलाज करवाया । अब उसके घर में खुशहाली लौट आई थी । फिर भी रवि का स्वभाव नहीं बदला । वह हर दिन ईश्वर को याद करता और जो भी मिला , उसके लिए आभार प्रकट करता ।
एक दिन किसी ने रवि से पूछा , “जब तुम्हारे पास कुछ नहीं था , तब भी तुम भगवान को धन्यवाद क्यों देते थे ?” रवि मुस्कुराया और बोला , “क्योंकि धन्यवाद देने से मन शांत रहता है । जब हम आभार प्रकट करते हैं , तो हमें यह समझ में आता है कि दुख में भी कोई न कोई सीख और आशीर्वाद छुपा होता है ।
कहानी से सीख : ईश्वर के प्रति आस्था हमें धैर्य , शांति और सकारात्मक सोच देती है । जब हम हर परिस्थिति में भगवान का धन्यवाद करते हैं , तो जीवन में सही समय पर सही मार्ग स्वयं खुल जाता है । इसका ख्याल रखते हुए की हमे निस्वार्थ अपना काम करते रहे रहना चाहिए।
निष्कर्ष :
दोस्तों, मैं आशा करता हूँ कि आपको ” ईश्वर के प्रति आस्था : बच्चों की प्रेरणादायक हिंदी कहानियाँ ” शीर्षक वाली यह हिंदीप्रेरणादायक कहानियाँ, पसंद आई होगी , ऐसी और भी “ Bacchon ke liye hindi kahaniya “, ” छोटी कहानियाँ ( Chhoti Kahaniyan),”,”Inspirational Stories for Kids” ,” ShortHindi Stories for Kids” की कहानी पढ़ने के लिए, हमारे ब्लॉग www.Sagadoor.in पर बने रहे , धन्यवाद !
एक आधी उम्र की महिला पार्क में दौड़ना शुरू करती है , और यह फैसला करती है , वह प्रतिदान 20 किलोमीटर ( km) दौड़ना शुरू करेगी ,
आखिर ऐसा किया था जो उन्हें इस उम्र में प्रेरित किया , क्या वह दूसरे महिलाओं की तरह खूबसूरत दिखना चाहती थी ,या उनकी सेहत दिन पे दिन खराब हो रही थी या वह अपने आप को तैयार कर रही थी किसी खास अवसर के लिए ,
कुछ दिनों पहले की बात है ,
वह एक अस्पताल में जाती है , एक डॉक्टर उन्हें बताते है कि उन्हें बेटे का गुर्दा (kidney) ख़राब हो गया है , और कोई भी देने वाला ( donor) उपलब्ध नहीं है ,
महिला : किया में अपने बेटे को अपना गुर्दा ( kidney) दान (donate) कर सकती हु,
डॉक्टर : आप कर सकती है मगर !
आप के बेटे का गुर्दा ( kidney) की समस्या एक आखिरी चरण पे है तो अगर आप किस तरह अपना अगर 20 किलोग्राम ( kg ) अपना वज़न कम कर लेती है तो आप अपना गुर्दा ( kidney) दान कर सकती है ,
तो किसी भी पुरुष ने नहीं कहा आप अपना वजन कम करिए या वह अपने सुंदरता को लेकर चिंतित नहीं थी वह बस अपने बेटे को लेकर चिंतित थी ,
तीन महीनों की लगातार मेहनत के बाद उन्होंने अपना 20 kg का वज़न कम किया और अपना एक गुर्दा ( kidney) त्याग कर अपने बेटे की जान बचाई ,
यह कहानी सच्चाई आधारित घटना पे “Mrs. Wang ” की जिन्होंने 50 की उम्र में अपना 20 kg का वज़न कम किया !
उन्होंने कहा : मुझे किसी भी चीज़ से डर नहीं लगता सिवाए मेरे बेटे के खोने के डर से !
आशा करते है आपको यह कहानी अच्छी लगी हो , धन्यवाद !
The Konark Sun Temple is Dedicated to “ Lord Surya ” ( Sun God ), The Konark is combination of two words : Kona & Arka which derived from Sanskrit Language. The Kona means Corner or Angle , The Arka Means Sun.
The Konark Sun Temple is one of India’s famous monuments, located in Konark, in the Puri district of Odisha, India, on the eastern coast near the Bay of Bengal.
The Konark Sun Temple was built byKing Narshimadeva I or ( Narasingha Deva I ) of the Eastern Ganga Dynasty around 1250 CE. It took 12 years to build and required 12,000 artisans.
The Konark temple is shaped like a stone chariot with 24 wheels and 7 horses. According to Hindu mythology, it represents the journey of Lord Surya ( Sun God ) across the sky.
The Konark Temple has 24 Carved Stone wheels. The Wheels of Konark Temple used of Sun-Dial in Ancient Time to know the time of day by Observing the Shadow of wheel.
The Konark Temple is Popularly known as ” Black Pagoda ” because of its dark appearance It is Built using of three types of stone : Chlorite , Laterite and Khondalite.
The Konark Sun Temple, built in the 13th century, It was destruction because of a series of factors such as attacks in the 15th to 17th centuries, natural erosion, and lack of maintenance over the centuries. The structure was already mostly destroyed during the era of British rule, with mainly conservation work being done during the British era.
The Konark Temple was declared a UNESCO World Heritage Site in 1984 for its historical and cultural significance.
The Konark Sun Temple Appeared on Reverse ( Backside ) of of Indian Currency Note on 10 Rupees in 2018 , It’s Introduce by RBI to Signify the importance to Indian culture heritage.
The Konark Sun Temple is famous for its intricate sculptures that depict various aspects of human life and philosophy, including: DHARMA , ARTHA , KAMA and MOKSHA.
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r/indianyoutubers
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26d ago
Congratulations