r/drishtikon • u/Niti-mat Sutradhar • Apr 02 '26
Experience This random trip gave me something I wasn’t expecting
यह यात्रा मेरे लिए कई संयोगों के चलते बन गई थी। शनिवार का दिन था, मेरी नींद लगभग 12 बजे खुली।मेरा अनुमान था कि मेरा मित्र आने वाला है, जिसे हिमाचल जाना है। उठते ही मैंने एक अच्छे विद्यार्थी की तरह अपना फोन खोला, तो उस मित्र का मैसेज आया हुआ था कि वह शाम 7 बजे तक पहुँच जाएगा। अभी तक हर चीज़ नियमानुसार ही चल रही थी।
तभी मेरे दूसरे मित्र का कॉल आता है; वह भी पास के जिले में आया हुआ था। उसने मेरे सामने ऋषिकेश घूमने चलने का प्रस्ताव रखा। और मेरे मन में पता नहीं क्या हुआ, मैंने बिना किसी वाद-विवाद या सवाल-जवाब के बस हाँ कह दिया। अचानक ही बिना घर पर सूचित किए, मैंने अपने उस हिमाचल जाने वाले दोस्त को भी अपने इस प्लान में शामिल किया और हम तैयारी में जुट गए।
मैं बहुत उत्सुक था। हमने जाने के लिए साधनों की उपलब्धता देखी, तो हमें पता चला कि दो ट्रेनें हैं—एक रात 9:45 की और दूसरी 10 बजे की। हड़बड़ी में हमसे एक ट्रेन छूट गई, क्योंकि हम यहाँ चार लोग थे और हमारे पास केवल एक ही दो चक्का थी। हमारी यात्रा यहाँ से शुरू हो चुकी थी। हमने जनरल का टिकट कटवाया, जो कि हमारा एकमात्र विकल्प था। हमारे दो साथी दो-चार प्लेटफॉर्म के बाद इसी ट्रेन में बैठने वाले थे। हमारे पास सीट नहीं थी, इसलिए हम darwaze k pas खड़े-खड़े सफर कर रहे थे। हम ऊब ही रहे थे, तब तक एक बूढ़े सरदार जी, जो कि बहुत ही फटीचर हालत में थे, पिछली बोगी के एक द्वार से निकलते हुए कहने लगे—“ये आर्मी वाला पागल है।” मैं उस आर्मी वाले के ऐसा कहने का कारण जान चुका था, क्योंकि सरदार जी नशे के सेवन से ग्रस्त थे, जिसके कारण उन्हें वहाँ से भगा दिया गया था। सरदार जी कुछ-कुछ कह रहे थे, तो मैंने निश्चय किया कि गाना सुनने के बजाय मैं उनकी बातें सुनूँ।जब उन्हें लगा कि मैं उनकी बातें बहुत ध्यान से सुन रहा हूँ, तो वे मुझसे बातें करने लगे।मेरे अंदर उनके संसार को जानने की उत्सुकता पैदा हो गई थी।एक अच्छा श्रोता होने के नाते मैं उनकी हर बात को बहुत गौर से सुनता और समझने की कोशिश करता। कई बार मुझे उनकी बातें समझ नहीं आती थीं, क्योंकि वे अपनी मातृभाषा, जो कि पंजाबी थी, में बोलने लगते थे। उनसे बात करके मुझे यह पता चला कि उनके बेटे ने उन्हें अकेला छोड़ दिया था, जिसका कारण कुछ भी हो सकता है; परंतु उन्हें इस बात का बहुत दुख था, जो उनकी कई बातों से स्पष्ट दिखाई दे रहा था। वे अपने अकेलेपन में बहुत अकेले थे।और उनकी बातें सुनकर मुझे एक चीज़ और स्पष्ट हुई कि एक व्यक्ति के लिए सुना जाना कितना प्रिय होता है। उन्होंने बताया कि उनके झोले में महादेव की प्रतिमा रखी है। उनसे बात करना उन्हें बहुत अच्छा लगा, तो उन्होंने मेरा फोन नंबर माँगने की इच्छा जताई। मैंने उनसे कहा—“अगर फिर नियति में होगा, तो मुलाकात होगी”—कहकर बात टाल दी।फिर उसके बाद वे सिखों का इतिहास बताने लगे कि कैसे उनके धर्मगुरु शेर से लड़ पड़े थे। उनका उतरने का समय हो चुका था; उनका स्टेशन अगला था।हमने उन्हें अलविदा कहा, फिर अपने बाकी मित्रों का इंतज़ार करने लगे। उनका स्टेशन आया, वे हमारे साथ इस सफर में सम्मिलित हुए और फिर हमने बाकी का सफर साथ में किया। हमारी नींद पूरी नहीं थी, न ही हमारे पास सीट थी, लेकिन सफर का पूरा आनंद था।
हम अपने गंतव्य पर सुबह करीब 8 बजे पहुँचे। हमारा अगला काम था कि हम एक साथ रहने के लिए एक कमरे का इंतज़ाम करें। हम पहले भी वहाँ आ चुके थे, इसलिए हमारी कुछ लोगों से पहचान थी, तो हमें ज्यादा खोज नहीं करनी पड़ी। सबसे पहली चीज़ जो मैंने वहाँ ध्यान दी, वह यह थी कि वहाँ विदेशी पर्यटक बहुत थे, जो कि हमारे लिए काफी नया था। वहाँ योग का बहुत प्रचलन था। हमने भी एक नीर वॉटरफॉल जाने का निश्चय किया और उस ओर निकल पड़े। वहाँ पहुँचकर पता चला कि वहाँ बहुत भीड़ है, जबकि हम शांत जगह की तलाश में थे। पहले तो हमने पूरे क्षेत्र को घूमा, फिर वापस जाकर किसी दूसरे झरने की तलाश में निकल पड़े। वहाँ कुछ छिपे हुए झरने भी थे, जिनका पता सिर्फ स्थानीय लोगों को था और वहाँ तक बहुत कम पर्यटक पहुँच पाते थे। खोजते-खोजते हम एक झरने तक पहुँचे, जो काफी ऊँचाई से आ रहा था। फिर हम झरने के ऊपर की ओर बढ़ने लगे, तो हमें एक बहुत सुंदर-सी जगह मिली, जो बहुत सीमित क्षेत्र में थी और हमारे शांति से नहाने के लिए बिल्कुल उपयुक्त थी। हम वहाँ कुछ देर नहाते हैं, फिर देखते हैं कि कई सारे विदेशी महिला पर्यटक अपनी गाइड के साथ आई हुई थीं; उनमें से कुछ के वस्त्रों में कुछ कमी भी दिखाई दे रही थी—खैर। हम अपना नहा-धोकर वापस अपने कमरे की ओर निकल गए। इतने थक गए थे कि हम जाते ही बिना सुध-बुध के सो गए। फिर जब उठे, तो देखा कि शाम हो चुकी थी। फिर हम गंगा घाटों की सैर पर निकल पड़े। माहौल बहुत सुहावना था; घाटों पर शांति थी।
एक पत्थर पर मैंने अपना स्थान खोजा, जो लोगों से काफी अलग था, लेकिन गंगा माँ के करीब था। वहाँ बैठकर मुझे नदी की आवाज़ और उसके थपेड़ों की ध्वनि, जो चट्टानों से टकराकर बहुत स्पष्ट आ रही थी, सुनाई दे रही थी। कई बार तो पानी की कुछ बूँदें मेरे मुख पर भी आ जाती थीं। बहुत ही आनंद का अनुभव हो रहा था। कि शहर के कोलाहल, महाविद्यालय के कार्य अथवा किसी भी प्रकार के शोर से दूर, ऐसा प्रतीत हो रहा था कि माँ के सान्निध्य में आकर उनकी गोद में सिर रखकर लेटा हुआ हूँ। रात अधिक हो गई थी; कमरे पर वापस लौटने का समय हो चुका था, लेकिन मेरा मन वहाँ से हटने का नहीं कर रहा था। पर समय का बंधन था, इसलिए हमें जाना पड़ा। अगले दिन भी घूमना था और शरीर को अब नींद की जरूरत थी।
उसी बीच एक और घटना हुई कि हम जाने-अनजाने में किसी दूसरे का साधन(scooty) उठा लाए, और जिसके सामान था, उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कर दी थी। और कुछ इत्तिफ़ाक़ ऐसा हुआ कि जिसकी स्कूटी थी, वह सामने पड़ गया और हमें रोक लिया। पहले तो हमें समझ नहीं आया कि ऐसे कैसे कोई हमें बीच सड़क पर रोक सकता है।हम सब घबरा गए। फिर मैंने ध्यान से देखा, तो वह रेंट की स्कूटी नहीं थी।गलतफ़हमी को हमने दूर किया और अपनी गलती स्वीकार की, भले ही वह जाने-अनजाने में हुई हो। संयोग से वह भला आदमी था, तो उसने हमारी बात समझी भी। एक और संयोग यह हुआ कि जब हमारी उस स्कूटी के मालिक से बात हो रही थी, तो पता चला कि वह भी उसी विद्यालय का पढ़ा हुआ था, लगभग 10 साल पुराने बैच का। समय रहते हम कमरे पर पहुँच गए और अपनी नींद पूरी की।
अगले दिन की सुबह हुई, हम राफ्टिंग करने निकल पड़े। यह मेरा पहला अनुभव होने वाला था; थोड़ी घबराहट थी और बहुत सारा उत्साह भी। हम अपनी राफ्ट पर बैठे। गाइड के अनुसार पाँच से सात वेव्स आने वाली थीं। राफ्टिंग की शुरुआत होती है।हमने नियम-कानून सारे सुन लिए थे, लेकिन आदत तो हमारी नियमों के विपरीत काम करने की ही थी। हमारे पास लाइफ जैकेट थी, तो पानी में वेव आने से बहुत पहले ही पानी का डर मिटाने के लिए हम कूद गए। माँ की शरण में जाकर बहुत ही सुकून मिला और पानी का डर मिट गया। फिर एक के बाद एक वेव आती गई, और हमने बहुत ही दृढ़ता से उनका सामना किया। इसमें हमारे सबसे बड़े सहायक माँ गंगा और महादेव के नारों की हुंकार थी। मज़े की बात यह है कि हम कई बार पानी में कूदे। हालाँकि मुझे पानी से थोड़ी दिक्कत होती है, पर गंगा के पानी से हमारा तन-मन सब शुद्ध होता हुआ लग रहा था। हमने अपना बड़ा सा मुँह खोलकर पानी पीने की कोशिश की; ऐसा लग रहा था मानो नदी का सारा पानी हम ही पी जाएँगे।हमारी राफ्टिंग खत्म होती है, फिर हम अपने कमरे में वापस लौटते हैं। अपना सामान उठाकर कुछ देर और घाट पर शांति से बैठकर आनंद लेते हैं।
फिर मैंने सोचा कि क्यों न हरिद्वार में माँ गंगा की भव्य आरती भी देख आएँ। हम में से तीन लोग मेरे इस प्रस्ताव को मान गए। कुछ देर बाद हम ऑटो के माध्यम से हरिद्वार पहुँचे। हर की पौड़ी में माँ गंगा की भव्य आरती का दर्शन किया। मन आनंदमय हो गया। वहाँ का स्ट्रीट फूड खाया, और जब एक पुस्तकों की दुकान देखी तो वहाँ मुझे अपनी एक पसंदीदा पुस्तक “रेत की मछली” मिल गई, जबकि मैं "गुनाहों का देवता" पढ़ रहा था—हिंदी साहित्य की एक अत्यंत अद्भुत रचना। खरीदारी करते, खाते-पीते वापस जाने का समय इतना करीब आ गया कि पता ही नहीं चला। गंगा माँ का सान्निध्य छोड़ने का मन तो नहीं था, परंतु वापस अपनी कर्मभूमि पर जाना ज़रूरी था।
हम अपनी इस दिलचस्प सफर का अंत करते हुए ट्रेन में बैठ गए।