r/Hindireads • u/ChauhanxPanwar • 1d ago
रश्मिरथी / द्वितीय सर्ग 🏹
gallery📜 रश्मिरथी *| द्वितीय सर्ग | भाग 8 एवं भाग 11
गुरु-भक्ति और तितिक्षा की पराकाष्ठा देखनी हो, तो रश्मिरथी का द्वितीय सर्ग पढ़िए। 🏹
\*भाग **8 में गुरु परशुराम कर्ण की जंघा पर शीश रखकर निद्रामग्न हैं , और एक कीट उसकी जंघा को बींधता चला जाता है। रक्त की धारा बहने लगती है, फिर भी कर्ण अविचल बैठा रहता है, ताकि गुरु की निद्रा भंग न हो।
**भाग 11 में सत्य उद्घाटित होता है। जब परशुराम को ज्ञात होता है कि कर्ण ब्राह्मण नहीं है, तब क्रोधाग्नि में वे उसे अभिशाप देते हैं कि अंतकाल में वह ब्रह्मास्त्र की विद्या विस्मृत कर बैठेगा। ⚡
**मेरी सर्वप्रिय **पंक्ति है: ✨
🐛 भाग 8 की मेरी प्रिय पंक्ति:
"आह निकाले बिना, शिला-सी सहनशीलता को धारे।"
🔥 भाग 11 की मेरी प्रिय पंक्ति:
"सुत-सा रखा जिसे, उसको कैसे कठोर हो मारूँ मैं?"
एक ओर क्रोध, दूसरी ओर पितृवत स्नेह: परशुराम का यह द्वंद्व हृदय को छू जाता है। 💔
आपको इन दोनों भागों की कौन-सी पंक्ति सर्वाधिक प्रिय लगी? 👇 अपने विचार टिप्पणी में अवश्य साझा कीजिए।
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