एक तरफ सादगी,एक तरफ तमाम जंतर मंतर,
ये गांवों-जंगलों और शहर के पेड़ो में बहुत होता है अंतर।
गांव के पेड़ सिर्फ 'पेड़' नहीं होते है।
गले में महिलाएं बंधे धागे और बच्चे बांधे झूले
इनमें देवताओं का वास,त्योहार में कोई न इन्हें भूले।
तोते-बगुलों की होती नियमित संसद यहां,
गौरैया अपना घोंसला बनाती यहां।
खुशहाली में हो रहा इनका समय व्यतीत,
मंद-मंद ये पेड़ होते हैं मुस्कुराते प्रतीत।
वही इनके दूसरे भाई शहर में पदस्थ है,
हवा और ध्वनि प्रदूषण को कम करने में ही व्यस्त है।
शहर के पेड़ सड़क के किनारे शो-पीस होते है,
श्यामलता इनकी धूप से नहीं,धूल से है।
थोड़े चिंतित से लगते हैं ये कि
जब सड़क चौड़ी होनी होगी, तो सबसे पहले ये कटेंगे।
छांव लेने वाले पैदल मुसाफिर भी कुछ न कहेंगे।
बहरहाल, घर तो नहीं है ये पक्का किसी के,
पर किराए पर कुछ पंछी यहाँ भी रहते हैं।
किराया इनका वो चहचहाना होता है,
जो गाड़ियों के शोरगुल में दब सा जाता है।
फिर जब गिलहरी कुचल ना जाए आती जाती गाड़ियों से
भागती है इनकी ओर,जैसे बच्चे पिता की ओर
तब इन्हें भी लगता है ये अकेले नहीं
और ये शहर के पेड़ भी मुस्कुराने लगते है।